बांध पुनरुज्जीवन... समय की मांग

हर साल मार्च महिना आते ही बांधों में घटता हुआ पानी, सुखा, टैंकर से पानी की सप्लाई, पिने के पानी के लिए लोगों का दर दर भटकना इन जैसी खबरें हर मिडिया में छाई रहती हैं| राज्य और स्थानिक प्रशासन हर साल सूखे से निपटने के लिए कई सौ करोड़ रुपये खर्च करती है मगर स्थिति हर साल बिगड़ती जा रही है| महाराष्ट्र में हो रही किसानों की आत्महत्याओंने तो एक गंभीर सामाजिक समस्या का रूप धारण किया है| इन सभी समस्याओं के पीछे मूल कारण हमारे बांधों की घटती जा रही जलधारण क्षमता यही है|

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हमें बारिश से पर्याप्त मात्रा में पानी मिलता है मगर बारिश का करीब ८५ प्रतिशत पानी बहकर समंदर में चला जाता है जिसे हम बांधों में रोक नहीं पाते है| प्रगत देशों में यह चित्र बिलकुल उल्टा है| वहां बारिश का ८५ प्रतिशत पानी बांधों में सुरक्षित रखा जाता है| भारत की विशाल जनसंख्या के लिए पेयजल, खेती, उद्योग, भवन निर्माण, इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के लगाने वाले पानी के लिए हम बांधों पर ही निर्भर है| दूसरी ओर देश के अधिकतर बांध मिट्टी से भरे पड़े है| बांध मिट्टी से भरे होने के कारण उनकी जलधारण क्षमता हर साल सिकुड़ती जा रही है|

विश्व की जनसंख्या के १८ प्रतिशत लोग भारत में रहते है मगर विश्व की तुलना में हमारे पास जलस्त्रोत केवल चार प्रतिशत ही है| ऐसी परिस्थिति में हमें मिलने वाली बारिश का हर बूंद बांधों में बांध कर रखनी होगी मगर हम करीब ८५ प्रतिशत पानी रोक पाने में असमर्थ हैं| एक अध्ययन के अनुसार वर्ष २०५० में भारत को १४५० क्यूबिक किलोमीटर पानी की आवश्यकता रहेगी मगर हम आज की ही व्यवस्था पर निर्भर रहेंगे तो ११५० क्यूबिक किलोमीटर इतनाही पानी मिल पाएगा| हमें करीब ३०० क्यूबिक किलोमीटर पानी की कमी का सामना करना पड़ेगा| यह कमी बीस प्रतिशत के आसपास है| भारत को विकसित राष्ट्र बनाने के हमारी महत्वाकांक्षा में यह एक गंभीर  समस्या बनाकर सामने आई है|

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वर्तमान और भविष्य के लिए हमें पानी बचाना होगा यह तो तय है, इसके लिए नए बांध बनवाना यह एक घिसापिटा, भारी लागत वाला और कई अड़चनों से भरा विकल्प है| बांध बनाने लायक जगह का न मिलना, सैकड़ों गावों का भूमि अधिग्रहण, पर्यावरण पर पड़ने वाला असर और विस्थापितों का पुनर्वसन जैसे कई आयाम नए बांध बनवाने के साथ जुड़े है|

इसके विपरीत जो बांध अभी कार्यरत है, उनमें बारिश के पानी के साथ हर साल बड़ी मात्रा में मिट्टी जमा हो रही है| बांध क्षेत्र में पेड़ों की कटाई से मिट्टी अधिक मात्रा में बांधों में आ रही है| इस मिट्टी के कारण हर साल बांधों की क्षमता घटती जा रही है| देश के आधे से अधिक बांध इस समस्या से ग्रस्त है| इस मिट्टी को बांधों से निकाला जाए तो उनकी मूल क्षमता फिर से स्थापित हो जाएगी| नए बांध बनवाने की तुलना में इस काम के लिए काफी कम लागत आती है| नए बांध बनवाने में आनेवाली एक भी समस्या इस काम में नहीं आएगी|

एक नया बांध बनाकर एक टी एम् सी पानी बचाकर रखने के लिए पांच हजार करोड़ की लागत आती है| इसकी तुलना में बांधों का पुनरुज्जीवन करना और  एक टी एम् सी जलधारण क्षमता स्थापित करने के लिए केवल बीस करोड़ रुपये की लागत आती है| यह बात ग्रीन थम्ब ने खडकवासला बांध पुनरुज्जीवन परियोजना में इस बात को सिद्ध करके दिखाया है| लोक्सहभागिता से इसे करने पर विधायक कार्य के लिए नागरिकों का संघटन हो जाता है, उनके सहयोग से किए जाने वाले काम में भ्रष्टाचार की संभावना नहीं रहती क्यों की हजारों हाथों के साथ साथ हजारों आँखें भी करी की गतिविधियाँ देख रही होती है|   

बांध में जमा मिट्टी काले सोने की तरह होती है| यह बेहद उपजाऊ प्राकृतिक खाद की तरह काम करती है| बांध क्षेत्र के  किसान इस मिट्टी से अपने खेत को अधिक उपजाऊ बना सकते है| इस मिट्टी की पानी पकड़कर रखने की क्षमता अधिक होती है, जिससे खेती के लिए पानी कम लगेगा| इसमें प्राकृतिक पोषक तत्व अधिक होने के कारण उर्वरकों का उपयोग कम होगा और यूरिया जैसे खादों पर दी जाने वाली हजारों करोड़ रुपयों के सबसिडी की बचत होगी|   

इन सभी कारणों से नए बांध बनवाने के बजाए देश के सभी बांधों में जमा मिट्टी निकलना हर तरह से लाभदायक है| इसके लिए शासनव्यस्था पर निर्भर रहने के बजाए जनसहभागिता और स्वयंसेवी संस्थाओं को साथ मिलकर देश के सभी बांधों का पुनरुज्जीवन करना होगा|

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